वैज्ञानिक विश्वसनीयता: उच्च
समुद्र की सतह से डेढ़ से तीन हज़ार मीटर नीचे, जहाँ सूर्य का एक भी फ़ोटॉन नहीं पहुँचता और जल का भार सैकड़ों वायुमंडलीय दाब के रूप में हर दिशा से दबाता है, एक मादा एबिसल एंगलरफ़िश लगभग स्थिर होकर ठंडे अंधकार में निलंबित है — उसके शरीर का अस्तित्व केवल उस एकल नीले-हरे प्रकाश-पिंड से प्रकट होता है जिसे वह अपने इल्लीसियम पर धारण करती है, और जिसे वैज्ञानिक एस्का कहते हैं। यह जीवित प्रकाश, जो सहजीवी बायोल्यूमिनेसेंट जीवाणुओं द्वारा उत्पन्न होता है, उसके अर्धचंद्राकार, पारदर्शी, पीछे की ओर मुड़े हुए दाँतों की कगार को क्षण-भर के लिए उजागर करता है और फिर कोयले-सी काली खाल तथा काँच-सा धुंधला नेत्र तत्काल अंधकार में विलीन हो जाते हैं। चारों ओर बिखरी हुई समुद्री हिम — मृत कोशिकाओं, मल-कणों और खनिज टुकड़ों का वह शाश्वत अवपात — लुरे के प्रकाश-वलय के निकट से गुज़रते हुए क्षण-भर चमकती है और फिर अनंत नीरवता में खो जाती है। यह जगत न किसी के लिए प्रतीक्षारत है, न किसी को पहचानता है — यहाँ का शिकार और शिकारी दोनों उस विशाल, दबावग्रस्त, प्राचीन अंधकार के अंग हैं जो मनुष्य के होने से बहुत पहले था और उसके जाने के बाद भी रहेगा।
समुद्र की सतह से डेढ़ से ढाई किलोमीटर की गहराई में, जहाँ सूर्य का प्रकाश सदा के लिए विलुप्त हो चुका है और जल का भार दो सौ वायुमंडलों से भी अधिक है, वहाँ एक वाइपरफ़िश अपने संकरे, बंदूक-धातु-से चमकते शरीर को एक तिरछी रेखा में काटती हुई तैरती है — उसके लंबे सुई-नुमा दाँत थोड़े खुले हैं, विशाल दर्पणी आँखें शिकार की प्रत्येक हलचल को ग्रहण करने को तैयार हैं। उसके इर्द-गिर्द चिंगट जैसे गहरे-समुद्री क्रस्टेशियनों का एक अनियमित, त्रिआयामी झुंड बिखर रहा है; उनके पारदर्शी शरीर भय से अलग-अलग दिशाओं में छिटकते हैं, और उनकी अव्यवस्था से उत्पन्न विक्षोभ नीले-सियान जैव-प्रकाश की स्पंदित चमकें छोड़ता है जो क्षण भर में उभरती हैं और फिर घुप्प नील-काले अंधकार में लीन हो जाती हैं। यह प्रकाश न किसी स्रोत से है, न किसी दिशा से — यह जीवन का अपना प्रकाश है, रासायनिक प्रतिक्रियाओं द्वारा जन्मा, शिकारी और शिकार दोनों के शरीरों में निहित एक विकासवादी रहस्य। चारों ओर का जल स्थिर और पारदर्शी है, जिसमें समुद्री हिम के सूक्ष्म कण — मृत कार्बनिक पदार्थ के टुकड़े — बिना किसी हलचल के तैरते हैं, और दूर-दूर कहीं एकाकी जैव-प्रकाश के बिंदु अंधकार में धीरे-धीरे विलीन होते जाते हैं, मानो यह संसार सदा से ऐसा ही था और सदा ऐसा ही रहेगा।
समुद्र की सतह से हजारों मीटर नीचे, जहाँ सूर्य का एक भी फोटॉन कभी नहीं पहुँचता और जल का दाब सैकड़ों वायुमंडलों के बराबर होता है, एक ड्रैगनफ़िश अपने शरीर को क्षैतिज रूप से थामे हुए अंधकार में विलीन हो रही है — केवल उसकी ठोड़ी से लटकती नाजुक बार्बेल और उसके देह के किनारों पर टिमटिमाते नीले-हरे फोटोफ़ोर्स ही उसके अस्तित्व की सीमारेखा खींचते हैं। ये जैवदीप्तिमान अंग कोई प्रकाश-स्तंभ नहीं, बल्कि एक निजी सांकेतिक भाषा है — प्रजाति-विशिष्ट, शिकार को आकर्षित करने या साथी को संकेत देने के लिए विकसित, उस मध्यरात्रि-क्षेत्र में जहाँ दृश्य संचार जीवन और मृत्यु के बीच की रेखा तय करता है। इस शिकारी की काली त्वचा मेलेनिन से इतनी परिपूर्ण है कि वह लगभग समस्त आपतित प्रकाश को अवशोषित कर लेती है, जो इसे छद्मावरण का एक उत्कृष्ट उदाहरण बनाती है जबकि इसके सुई-जैसे दाँत और विशाल नेत्र किसी भी चमकते शिकार को क्षण भर में पकड़ने के लिए सदा तत्पर रहते हैं। चारों ओर केवल ठंडा, स्थिर, लगभग शाश्वत जल है — जिसमें 'मरीन स्नो' के सूक्ष्म कण धीरे-धीरे तैरते हुए नीचे जा रहे हैं — और यह संसार हमारी अनुपस्थिति में भी, हमसे पूर्णतः निरपेक्ष होकर, अपनी लय में जीता रहा है।
समुद्र की सतह से एक हजार मीटर से भी नीचे, जहाँ सूर्य का प्रकाश पूरी तरह विलीन हो चुका है और जल का भार लगभग सौ वायुमंडलीय दाब के बराबर हो जाता है, एक गॉब्लिन शार्क बेसाल्ट की खड़ी चट्टानी कगार के ऊपर निस्पंद जल में तैरती है — उसकी चपटी, लंबी थूथन और राख-धूसर, पारभासी त्वचा उस अवशिष्ट नील-काली आभा में बमुश्किल दृश्यमान है जो ऊपर के असीम जल से अंतिम श्वास की तरह नीचे उतर रही है। यह प्राणी — *Mitsukurina owstoni* — विकास की सबसे पुरानी शाखाओं में से एक का प्रतिनिधि है, जिसकी छोटी काली आँखें और शिथिल किंतु घातक मांसपेशियाँ इस अतल अंधकार में लाखों वर्षों की अनुकूलन-यात्रा का प्रमाण हैं। बेसाल्ट की दरारों और ज्वालामुखीय कगारों के बीच से सायनोजेनिक और नील-हरित बायोल्यूमिनेसेंट कण — अदृश्य प्लवकों और सूक्ष्म जीवों के जीवित स्फुलिंग — जल-स्तंभ में मंद गति से बहते हैं, जैसे किसी अनंत रात्रि में बिखरे तारे। समुद्री हिम के महीन कण चुपचाप नीचे उतरते हैं, और इस विशाल, भारी, निर्जन जल में शार्क की उपस्थिति किसी साक्षी की माँग किए बिना, सदा से यहाँ विद्यमान एक संसार की शाश्वत, निःशब्द सच्चाई की तरह बनी रहती है।
समुद्र की सतह से हज़ारों मीटर नीचे, जहाँ सूर्य का एक भी कण कभी नहीं पहुँचता, एक मैग्नापिन्ना विद्रूप अपने विशाल, पारदर्शी मेंटल के साथ ऊर्ध्वाधर स्थिति में निलंबित है — उसके चौड़े त्रिकोणीय पंख जलस्तंभ में बमुश्किल दृश्यमान हैं, और उसकी असाधारण रूप से लंबी भुजा-तंतुएँ अपने विशिष्ट कोहनी-जैसे मोड़ों पर झुकती हुई अतल अंधकार में विलीन हो जाती हैं। यहाँ जलस्थैतिक दाब दो सौ वायुमंडल से भी अधिक है, तापमान दो से चार डिग्री सेल्सियस के बीच स्थिर है, और जीवन का एकमात्र प्रकाश-स्रोत जीवों का अपना जैवप्रदीप्ति है — दूर बिखरे हुए नीले-हरे प्लवक के स्पंदन और क्षितिज पर जलतापीय प्रवाहों की अत्यंत क्षीण नारंगी आभा। समुद्री हिमपात के महीन कण — मृत जीवों और कार्बनिक पदार्थों के अवशेष — इस असीम जलस्तंभ में धीरे-धीरे नीचे उतरते हैं, और मैग्नापिन्ना की लंबी तंतुएँ संभवतः इन्हीं दुर्लभ पोषण-कणों या सूक्ष्म जीवों को निष्क्रिय जाल की तरह थाम लेती हैं। यह संसार किसी साक्षी की प्रतीक्षा में नहीं है — यह युगों से यों ही विद्यमान है, मौन, अदृश्य और अपने आप में पूर्ण।
समुद्र की सतह से एक हजार मीटर से भी अधिक नीचे, जहाँ सूर्य का एक भी फोटॉन कभी नहीं पहुँचता, गल्पर ईल ने अपना विशाल झिल्लीदार मुख इस प्रकार फैलाया है कि वह नीले-बैंगनी अंधकार में एक असंभव गुम्बद-सा प्रतीत होता है — यह विकास के लाखों वर्षों की वह उपलब्धि है जो शिकार की दुर्लभता को असाधारण अवसरवादिता से जीतती है। *Eurypharynx pelecanoides* की यह प्रजाति अपने स्वयं के शरीर से कई गुना बड़े शिकार को निगल सकती है, क्योंकि इसके जबड़े के स्नायु-बंधन और पारदर्शी मौखिक झिल्ली असाधारण रूप से प्रत्यास्थ हैं — दो सौ वायुमंडल से अधिक के जलस्तंभीय दाब में भी यह संरचना अपना कार्य करती है। फँसे हुए शिकार के समूह से निकलती असमान जैव-प्रदीप्त स्पंदनें — शीतल सायन-हरित चमकें — ईल के मुख के भीतर सुई-जैसे दाँतों और चिकनी आंतरिक सतहों को क्षण-क्षण रेखांकित करती हैं, जबकि आसपास का जल मरीन स्नो के विरल कणों और जैविक चिनगारियों से शांत भाव से भरा है। दूर नीचे, हाइड्रोथर्मल उत्सर्जन की धुंधली नारंगी-लाल आभा अंधकार की एक परत को दूसरी से बमुश्किल अलग करती है — यह एक ऐसा संसार है जो मनुष्य की किसी भी उपस्थिति से सर्वथा निरपेक्ष, अपनी ही गहरी, मौन लय में जीता और मरता है।
समुद्र की सतह से हजारों मीटर नीचे, जहाँ सूर्य का एक भी कण कभी नहीं पहुँचता, मध्य-महासागरीय कटक की दरारों से हाल ही में उगला गया बेसाल्ट अपनी आंतरिक ऊष्मा को लाल-नारंगी दरकती रोशनी में समेटे हुए है — यह पृथ्वी की अपनी जीवित साँस है, जो काले जल में धीरे-धीरे ठंडी पड़ती है। इस अभेद्य अंधकार में, जहाँ दाब लगभग तीन सौ वायुमंडल तक पहुँचता है और तापमान मुश्किल से दो से चार डिग्री सेल्सियस रहता है, एक मत्स्यांगार अपना नीला-सफ़ेद चमकीला लालच-दीप लहराते हुए टूटे हुए लावा-शिलाखंडों के बीच से गुज़रता है, उसके पारदर्शी वक्र दाँत अदृश्य शिकार की प्रतीक्षा में तैयार हैं। वाइपरफ़िश की धात्विक त्वचा बायोल्युमिनेसेंट प्लवकों की क्षणिक चमक में उभरती और फिर अँधेरे में विलीन हो जाती है, जबकि मैग्नापिन्ना स्क्विड के असाधारण रूप से लंबे भुजा-तंतु जल-स्तंभ में पतले पीले फीतों की भाँति नीचे की ओर लटके हुए हैं। यह संसार किसी दृष्टि या साक्षी के बिना सदा से ऐसे ही अस्तित्व में रहा है — रासायनिक संश्लेषण, बायोल्युमिनेसेंस, और विकासवादी परिपूर्णता से बना एक मौन, अथाह ब्रह्मांड, जो हमारी उपस्थिति से सर्वथा अनजान है।
समुद्र की सतह से एक से चार किलोमीटर नीचे, जहाँ जलस्तंभ का भार सौ से चार सौ वायुमंडल के बराबर दबाव बनाता है, मध्य-महासागरीय कटक की ताज़ी बेसाल्टी चट्टानों से सल्फाइड चिमनियाँ आकाश की ओर उठती हैं और उनके मुखों से काले खनिज बादल अंधकार में घुलते जाते हैं — यह ऊष्मजलीय द्वार रासायनिक संश्लेषण पर जीवित एक पूरी खाद्य-शृंखला का आधार है, जिसे सूर्य की एक भी किरण कभी नहीं छूती। उस धुएँ के किनारे पर एक गहरा शिकारी मछली सटीक नियंत्रण के साथ सरकती है — उसकी देह पर नीले-हरे जैवदीप्तिमान बिंदुओं की झलक और वेंट के मुख से उठती क्षीण जंग-लाल ऊष्मीय आभा उसकी रूपरेखा को उजागर करती है, जबकि उसके जबड़े और पेशियाँ इस विनाशकारी दबाव को सहने के लिए विकास की करोड़ों वर्षों की प्रक्रिया से ढली हैं। गहन अंधकार में और पीछे एक एंगलरफ़िश की नन्ही लालटेन-जैसी आकर्षिका मंद-मंद दमकती है, एक वाइपरफ़िश की सुई-दाँत वाली आकृति प्लूम की परछाईं में घुली है, और असीम भुजाओं वाले मैग्नापिन्ना स्क्विड का भूतिया अस्तित्व काले जल में विलीन होता जाता है — ये सब उस जगत के प्राणी हैं जो हमारी अनुपस्थिति में भी उतनी ही तीव्रता से जीता, शिकार करता और मरता रहा है। खनिज कणों और समुद्री हिम से भरा यह जल एक ऐसी आदिम चुप्पी को धारण करता है जो पृथ्वी पर जीवन के उद्गम के उतनी ही निकट है जितनी कोई भी जगह हो सकती है।
समुद्र की सतह से लगभग एक से चार हजार मीटर की गहराई में, जहाँ सूर्य का एक भी कण कभी नहीं पहुँचता, एक विसरित जलतापीय प्रवाह की सीमा पर गंधक-पीले खनिज निक्षेपों और काले बेसाल्ट की दरारों से गर्म, खनिज-समृद्ध जल ऊपर उठता है और हिमशीतल गहरे समुद्री जल से टकराकर एक काँपती हुई अदृश्य-सी विकृति रचता है। इसी संकरी सीमारेखा पर एक छोटा रसातली एंगलरफ़िश पूर्णतः स्थिर है — उसका दबाव-अनुकूलित शरीर कोमल किंतु घातक है, और उसके माथे पर लटकी बायोल्युमिनेसेंट ललकार से नीली-हरी रोशनी की एक सघन बूँद टपकती है, जो अंधेरे में शिकार को भ्रमित करने की लाखों वर्षों की विकासवादी चाल है। चारों ओर सूक्ष्मजीवी चमकों और वेंट-जीवों की बायोल्युमिनेसेंस से हल्की सियान-हरी स्पंदनें फैलती हैं, जबकि गर्म वेंट रिसाव से उठती एक क्षीण रासायनिक-दीप्ति नारंगी-अम्बर आभा बेसाल्ट की सतह पर चिपकी रहती है, जो मैट माइक्रोबियल झिल्लियों और काँचीले पत्थर के किनारों की बनावट को बिना किसी बाहरी स्रोत के बहुत धीरे उजागर करती है। समुद्री हिम के महीन कण और खनिज कण बिना किसी दिशा के मुक्त बहते हैं, दबाव इतना है कि तीन सौ वायुमंडल से अधिक है, और पृष्ठभूमि में नीला-काला अंधकार असीम है — केवल कहीं-कहीं किसी अज्ञात प्राणी की ठंडी बायोल्युमिनेसेंट बिंदु टिमटिमाती है, यह संसार हमारे बिना भी, हमसे पहले भी, और शायद हमारे बाद भी इसी मौन, आदिम स्थिरता में जीता रहेगा।
समुद्र की सतह से हजारों मीटर नीचे, जहाँ सूर्य का एक भी कण कभी नहीं पहुँचता, एक विशाल व्हेल के अवशेष अंधेरे महीन तलछट पर बिखरे पड़े हैं — कशेरुकाओं के हड्डी-श्वेत चाप और पसलियों के टुकड़े, जिन पर सल्फाइड की काली परत और सूक्ष्मजीवों की धुंधली चमक फैली है, मानो मृत्यु ने यहाँ अपना एक स्थायी साम्राज्य बना लिया हो। लगभग दो सौ से तीन सौ वायुमंडलीय दाब के इस निर्जन अंधकार में, जहाँ तापमान मात्र दो से चार डिग्री सेल्सियस है, जल-स्तंभ जीवन की परतों से भरा है — क्षणिक सियान और हरे जैव-प्रकाश की फुलझड़ियाँ भड़कती हैं जब झुंड में आए मांसाहारी और मेहतर प्राणी हड्डियों के ऊपर मँडराते हैं, और उन क्षणिक चमकों में एंगलरफ़िश के नन्हे नीले-हरे प्रलोभक, वाइपरफ़िश की सुई-सी दाँतों की रूपरेखा, और जल में स्वतंत्र रूप से बहते समुद्री हिम के कण एक पल के लिए दृश्यमान हो जाते हैं। पृष्ठभूमि के सुदूर अंधकार में एक मैग्नापिन्ना स्क्विड की असंभव रूप से लंबी भुजाएँ उतरती प्रतीत होती हैं, और क्षितिज के छोर पर एक धुंधली लालिमा — संभवतः किसी जलतापीय प्रभाव की — रात की तरह काले पानी में घुलती जाती है; यह संसार बिना किसी साक्षी के, बिना किसी स्मृति के, अपनी पूर्ण और गहन निस्तब्धता में विद्यमान रहता है।
विशाल अंधकार के हृदय में, जहाँ सूर्य की एक भी किरण कभी नहीं पहुँचती और जल का दबाव दो सौ वायुमंडलों से भी अधिक होता है, मेडुसा जीवों की एक जीवंत छतरी मंद-मंद स्पंदित होती है — उनकी पारदर्शी घंटियाँ और रेडियल नलिकाएँ एक के बाद एक नीली-हरी जैवप्रदीप्ति की लहरों में प्रज्वलित होती हैं, जो इस असीम कृष्ण जल में एकमात्र प्रकाश का स्रोत हैं। ये जिलेटिनी प्राणी दबाव-अनुकूलित ऊतकों से निर्मित हैं, उनके शरीर में कोई गैस-भरी गुहा नहीं, केवल जल-सघन, लचीला जीवद्रव्य जो इस कुचलने वाले परिवेश में भी अटूट है। समुद्री हिम के कण — जैविक अवशेषों के सूक्ष्म टुकड़े — उनकी बायोल्यूमिनेसेंट आभा में क्षण-भर चमककर फिर अंधेरे में विलीन हो जाते हैं, मानो यह गहराई अपना ही एक आकाश रचती हो जिसमें तारे नीचे की ओर गिरते हैं। उस जीवंत प्रकाश-छतरी के नीचे, एक गहरे रंग की शिकारी आकृति मौन और अदृश्य-सी फिसलती है — संभवतः कोई ड्रैगनफ़िश या वाइपरफ़िश, जिसके विस्तार योग्य जबड़े और संवेदनशील पार्श्व रेखाएँ इस अभेद्य अंधकार में भी शिकार की गति को भाँप लेती हैं। यह संसार मानवीय दृष्टि से परे, बिना किसी साक्षी के, युगों से इसी प्रकार — स्पंदित, शिकार करता, और निर्विकार रूप से जीवित — बना रहा है।
समुद्र की सतह से एक हजार से चार हजार मीटर की गहराई में, जहाँ सूर्य का कोई भी प्रकाश कभी नहीं पहुँचता, एक एकाकी शिकारी मध्यरात्रि के जल में विचरण करता है — उसका मैरून-काला शरीर इस अनंत अंधकार में लगभग विलीन हो जाता है, केवल उसके विरल सायन जैव-प्रकाशमान अंगों की धुंधली रेखाएँ उसके अस्तित्व का संकेत देती हैं। लगभग एक सौ से चार सौ वायुमंडलीय दाब के इस कुचलते संसार में, समुद्री हिम — मृत कार्बनिक कणों, मलबे और सूक्ष्मजीवों का वह शाश्वत प्रवाह — निरंतर और मौन रूप से नीचे गिरता रहता है, जैसे कोई अनंत काल से चला आ रहा अनुष्ठान हो। इस जल स्तंभ के दूर क्षितिज पर किसी जलतापीय स्रोत से उठती हुई नारंगी-लाल रासायनिक चमक अपनी उपस्थिति का संकेत देती है, जो इस निर्जन भूगर्भीय सक्रियता की याद दिलाती है। नीचे, अथाह गहराई में, बेसाल्टी चट्टानों और महीन गाद से बनी अगाध तलभूमि मौन पड़ी है — स्थिर, हिमशीतल और असीम — एक ऐसा संसार जो मनुष्य की किसी भी स्मृति या उपस्थिति से सर्वथा अनजान है, और जो अपनी शर्तों पर, अपनी लय में, अनादि काल से जीता आ रहा है।
समुद्र की सतह से एक से चार हज़ार मीटर की गहराई में, जहाँ सूर्य की एक भी किरण नहीं पहुँचती, वहाँ एक सिफ़ोनोफ़ोर अपनी जीवित ज्यामिति को अंधे जल में फैला देता है — नीले-हरे बायोल्यूमिनेसेंस से दीप्त पतले तंतुओं का एक नक्षत्र-जाल, जो शिकार को आकर्षित करने के लिए विकास द्वारा परिष्कृत एक जैविक जाल है। इस जाल की परिधि में, लगभग अदृश्य, एक वाइपरफ़िश स्थिर प्रतीक्षा में है — उसकी धातुई काली देह सैकड़ों वायुमंडलीय दाब में भी अटल, उसके सुई-जैसे दाँत केवल तभी दिखते हैं जब निकटवर्ती जीवों की क्षणिक चमक उन्हें छू जाती है। यहाँ का जल शीतल, स्थिर और अबाध है — तापमान मुश्किल से दो से चार डिग्री सेल्सियस — और इस निस्तब्धता में समुद्री हिम के सूक्ष्म कण धीरे-धीरे नीचे उतरते हैं, इस विशाल अँधेरे जगत की एकमात्र गतिशीलता। दूर क्षितिज पर, मध्य-महासागरीय कटक के ऊपर जलतापीय स्रोतों से उठता नारंगी-लाल रासायनदीप्ति का धुंधला आभास यह स्मरण कराता है कि पृथ्वी का भूतापीय हृदय यहाँ भी स्पंदित है — और इन सबके बीच, शिकारी और जाल, दोनों उस संसार के प्राणी हैं जो मनुष्य की अनुपस्थिति में भी सदा से विद्यमान रहा है।
समुद्र की सतह से हजारों मीटर नीचे, जहाँ सूर्य का एक भी कण कभी नहीं पहुँचता, हाइड्रोथर्मल द्वारों से उठती रासायनिक ऊर्जा ने जीवन का एक असंभव संसार रच दिया है — विशाल नलिका कृमियों के घने वन, जिनके हाथीदाँत जैसे सफेद आवरण और मुलायम लाल प्लूम वेंट की अपनी खनिज-दीप्ति और ताज़े बेसाल्ट की मंद नारंगी आभा में धुंधले उघड़ते हैं, जबकि काले धुएँदार स्तंभ ऊपर उठकर ठंडे नीले-काले जल में विलीन हो जाते हैं। इस उपनिवेश की परिधि पर, जहाँ छोटे जीवों की सियान और नीली जैव-प्रकाशीय चमकें गीले काइटिन और सल्फाइड-दागे पत्थर को क्षण-भर उजागर करती हैं, एक रसातली एंगलरफ़िश निश्चल प्रतीक्षा में है — उसका मैट, मखमली शरीर लगभग तीन सौ वायुमंडल के दबाव में ढला हुआ, पारदर्शी दाँतों से भरे विशालकाय जबड़े अँधेरे में खुले, और उसके मस्तक के ऊपर एक ठंडी हरित-सियान लालटेन धीमे-धीमे दोलन करती है जो अपने आप में जीवन की आग है, किसी बाहरी स्रोत की नहीं। और भी पीछे, खनिज कोहरे के परदों के उस पार, एक वाइपरफ़िश की सुई-सी छाया और मैग्नापिन्ना स्क्विड के अलौकिक लटकते तंतु अँधेरे जल में भूत की तरह घुलते हैं — यह संसार बिना किसी साक्षी के, अपनी ही गहन लय में सदा से चलता आया है।