समुद्र की तलहटी में, जहाँ सूर्य की एक भी किरण कभी नहीं पहुँचती, हज़ारों मीटर के जलस्तंभ का भार चट्टानों को दबाए रखता है — वहाँ सल्फाइड की एक विशाल दीवार पर सैकड़ों येती केकड़े कंधे-से-कंधा भिड़ाए खड़े हैं, उनके हाथीदाँत-सफ़ेद शरीर उस उष्ण खनिज-धुंध में एक अलौकिक बगीचे की रचना करते हैं। इन केकड़ों के लंबे रोमिल पंजे — जिन पर बारीक सेटी की पंक्तियाँ स्पष्ट दिखती हैं — वेंट के गर्म प्रवाह में ऊपर उठे हैं, क्योंकि वे उन जीवाणु-फ़िल्मों की खेती करते हैं जो इस निर्जन अंधकार में उनका एकमात्र आहार हैं; यह सम्पूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र प्रकाशसंश्लेषण नहीं, बल्कि **रसायनसंश्लेषण** पर टिका है — हाइड्रोजन सल्फाइड को ऊर्जा में बदलकर जीवन पनपता है। काले धुएँ के स्तंभ पृष्ठभूमि में उठते हैं, उनके सबसे गर्म सिरों पर अंगार-लाल रासायनिक दीप्ति जलती है, जबकि ताज़े बेसाल्ट की दरारों से एक मंद ऊष्मीय आभा फूटती है और आसपास के सूक्ष्म जीवों की नीली-हरी जैवदीप्ति इस दृश्य में बिखरी हुई है। चट्टान पर चाँदी-सी चमकती जीवाणु-परतें, गीले क्रिस्टलीय खनिज-क्रस्ट, और ऊपर तैरते हुए समुद्री हिम के कण — यह सब उस विराट मौन की गवाही देते हैं जिसमें यह संसार युगों से, बिना किसी साक्षी के, अपने आप में पूर्ण होकर जीता आया है।