महाद्वीपीय ढलान की यह विशाल चारकोल-सी दीवार ठंडे नीले-काले धुंध में तिरछी उतरती जाती है, जहाँ लगभग 400 से 500 मीटर की गहराई पर जल-दाब 40 से 50 वायुमंडल के बराबर होता है और सूर्य का प्रकाश केवल एक क्षीण, नीली स्मृति बनकर रह जाता है। ऊपर से छनकर आती यह अवशिष्ट रोशनी इतनी मंद है कि जल-स्तंभ का संपूर्ण रंगपट कोबाल्ट, इंडिगो और काले तक सिमट जाता है — यही मेसोपेलेजिक संधि-प्रकाश का अपना एकाकी सौंदर्य है। लैंटर्नफ़िश अपने चाँदी-काले पार्श्वों पर फ़ोटोफ़ोर्स की पंक्तियाँ लिए इस अर्ध-अंधकार में तैरती हैं, कभी-कभी ऊपर के धुंधले नीले विरुद्ध स्पष्ट छायाचित्र बनाती हैं, तो कभी एक क्षणिक चाँदी-सी चमक छोड़कर अदृश्य हो जाती हैं। काँच जैसी पारदर्शी झींगे अपनी बारीक मूँछों और छोटी-छोटी काली आँखों से ही पहचानी जाती हैं, उनके भीतर कहीं-कहीं नीली-हरी जैवदीप्ति की एक मृदु लौ जलती है, मानो अँधेरे ने अपना खुद का तारामंडल रच लिया हो। समुद्री हिमकण — मृत जीवों के सूक्ष्म अवशेष — धीरे-धीरे गहराई की ओर प्रवाहित होते हैं, और यह संसार, जो हम से पूर्णतः अनजान है, अपनी अनंत चुप्पी में अविचलित बना रहता है।