समुद्र की सतह से हजारों मीटर नीचे, जहाँ जल का भार लगभग 400 से 600 वायुमंडलीय दबाव के बराबर हो जाता है और तापमान मात्र 1 से 2 डिग्री सेल्सियस के आसपास ठहरा रहता है, वहाँ एक विशाल और लगभग समतल अगाध मैदान फैला हुआ है — ठंडे, भूरे-स्लेटी कैल्शियमी और सिलिकामय पंक से ढका, जिस पर मैंगनीज के काले गाँठदार पिंड बिखरे पड़े हैं। इन्हीं में से एक पिंड पर, मैदान से थोड़ा ऊपर उठे एक कठोर आधार पर, एक डंठलदार क्रिनॉइड — समुद्री लिली — अपनी हाथीदाँत रंग की, महीन पंखों जैसी भुजाओं को धीमी अतल धारा में पूरी तरह खोले खड़ा है, प्रत्येक पिनुल सूक्ष्म जाल की भाँति जल से कणीय पोषण छानती हुई। ऊपर से निरंतर गिरता 'समुद्री हिमपात' — मृत प्लवकों, मल-कणों और कार्बनिक अवशेषों का वह अनंत वर्षण — इस प्राणी का एकमात्र भोजन-स्रोत है, जो सतह की दुनिया और इस अंधकारमय तल के बीच की एकमात्र जैविक डोर है। दूर जल-स्तंभ में नीले-हरे रंग के जैवप्रकाशीय स्फुलिंग क्षण भर के लिए चमकते हैं — किसी अदृश्य जीव का स्वयंप्रकाश — और पृष्ठभूमि में धुंधली समुद्री खीरें मंथर गति से पंक पर विचरण करती हैं, इस निःशब्द, अप्रकाशित और मनुष्य की दृष्टि से सर्वथा अछूते संसार में जीवन की अटूट उपस्थिति की साक्षी बनती हैं।
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