प्रशांत या अटलांटिक महासागर की गहराई से उठता यह ज्वालामुखीय पर्वत अपने शिखर पर सूर्य की प्रथम किरणों को उसी क्षण थाम लेता है जब भोर की रोशनी जल की सतह को चीरती हुई नीचे उतरती है — देवदूत की उँगलियों जैसी प्रकाश-रेखाएँ, गॉड-रेज़, बेसाल्ट के टूटे पठार और कार्बोनेट के फर्श पर काँपती हुई, जल को जीवित नीले रंग में रंग देती हैं। इस शिखर पर जहाँ कठोर सब्सट्रेट और तीव्र धाराएँ मिलती हैं, वहाँ प्लवक सांद्र होता है और उसी सांद्रता के इर्द-गिर्द लाखों छोटी चाँदी-सी मछलियाँ एक जीवित बादल — बेटबॉल — में सिमट जाती हैं, हर क्षण अपना आकार बदलती हुई, प्रकाश की चमक को हज़ारों चाँदी के टुकड़ों में बिखेरती हुई। येलोफिन टूना — Thunnus albacares — जो डेढ़ मीटर तक लंबे और सौ किलोग्राम से अधिक के हो सकते हैं, अत्यंत वेगवान शिकारी हैं; उनकी सुनहरी-इस्पाती देह वक्र खींचती है, तेज़ मुड़ती है, इस सजीव बादल को चीरती है — उनका हर प्रहार जल में दबाव-तरंगें उत्पन्न करता है जिसे बेटबॉल की मछलियाँ अपनी पार्श्व-रेखाओं से अनुभव कर, भय में और सघन होती जाती हैं। पठार के बाहरी किनारों पर गोर्गोनियन प्रवाल धारा में लहराते हैं और जैक्स की मंडलियाँ कड़े दल में घूमती हैं, जबकि थोड़ी गहराई में जहाँ पठार खुले महासागर में टूटकर गिरता है, काले प्रवाल अंधेरी कगारों से चिपके रहते हैं — यह पूरा दृश्य एक ऐसी दुनिया का है जो हमारे बिना, हमसे पहले और हमारे बाद भी, उसी मौन में धड़कती रहती है।