सांझ के आख़िरी नीले उजाले में, AUV का नोज़-कैमरा ऊपर की ओर झुका हुआ है और 280 मीटर की गहराई से चढ़ते हुए एक ऐसा दृश्य सामने आता है जो किसी जीवित आकाशगंगा से कम नहीं — हज़ारों पतली-दुबली लैंटर्नफ़िश स्तरदर-स्तर ऊपर की ओर बढ़ रही हैं, उनके चाँदी जैसे पहलू उस क्षीण, नीली रोशनी में क्षण-भर चमकते हैं और फिर अँधेरे में विलीन हो जाते हैं। यह वही विशाल दैनिक प्रवास है जिसे वैज्ञानिक डीप स्कैटरिंग लेयर कहते हैं — एक चलायमान जैविक क्षितिज जो द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान सोनार संचालकों को नकली समुद्री तल लगता था, क्योंकि इसमें समाए लाखों प्राणियों के स्विम-ब्लैडर ध्वनि तरंगों को इतनी शक्ति से लौटाते हैं कि यह पत्थर की तह-सी प्रतीत होती है। यहाँ दबाव लगभग 28 वायुमंडल है, तापमान तेज़ी से गिर चुका है, और ऊपर से आती रोशनी इतनी क्षीण है कि पारदर्शी टेनोफ़ोर और काँच-सी झींगे केवल अपनी अपवर्तक रूपरेखाओं और बायोल्युमिनिसेंट चिनगारियों से अपना अस्तित्व जताते हैं। जल-स्तंभ में तैरते महीन समुद्री हिम के कण उस ऊपरी नीली आभा में चमकते हैं और नीचे की ओर अँधेरे में खो जाते हैं — मानो पूरा समुद्र साँस ले रहा हो, और यह AUV उस साँस के साथ ऊपर उठ रहा हो।
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