सबमर्सिबल की मोटी ऐक्रेलिक खिड़की से झाँकते हुए, आँखें एक ऐसे अजीब क्षितिज पर टिक जाती हैं जो न तो समुद्र की तलहटी है और न ही कोई चट्टान — बल्कि यह जीवन की एक घनी, धुँधली दीवार है, जो चारकोल-नीले रंग में लटकी हुई किसी तूफ़ानी बादल की तरह दिखती है। लगभग ३५० मीटर की गहराई पर, जहाँ दबाव पृथ्वी की सतह से लगभग ३५ गुना अधिक है, हज़ारों मायक्टोफ़िड मछलियाँ, क्रिल और छोटे झींगे एक ऐसी जैविक परत बनाते हैं जिसे द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान सोनार ऑपरेटरों ने भूलवश समुद्री तल समझ लिया था — इसीलिए इसे "झूठी तलहटी" कहते हैं। ऊपर से आती मंद कोबाल्ट-नीली रोशनी इस परत की ऊपरी सीमा को बहुत हल्के से रेखांकित करती है, जबकि इसका निचला किनारा खुले काले जल में धीरे-धीरे घुलता जाता है, और बीच-बीच में किसी लालटेन मछली के फ़ोटोफ़ोर्स की मद्धिम बायोल्यूमिनेसेंट चमक अँधेरे को क्षण भर के लिए भेदती है। सबमर्सिबल की हल्की रोशनी कुछ ही मीटर दूर तक समुद्री हिमकण और नज़दीकी क्रस्टेशियंस को उजागर करती है, उसके आगे प्रकृति का यह विशाल, सजीव घूँघट अपने रहस्यों को समेटे निश्चल लटका रहता है।