विशाल अंधकार में, जहाँ सूर्य का एक भी कण कभी नहीं पहुँचा, लगभग चार सौ वायुमंडलीय दाब के बीच एक शुक्राणु व्हेल (*Physeter macrocephalus*) अपनी विशाल, झुर्रीदार देह को आगे बढ़ाती है — उसके कुंद माथे पर प्रकृति का सबसे शक्तिशाली जैविक सोनार धड़कता है, और उसके सामने विशाल स्क्विड (*Architeuthis dux*) की लंबी भुजाएँ अंधेरे में धाराओं की तरह पीछे खिंचती जाती हैं। जब भी इन दो महाकायों के शरीर पानी को चीरते हैं, उस हलचल से उत्तेजित सूक्ष्म जीव और प्लवकीय प्राणी नीले-हरे प्रकाश की चिंगारियाँ छोड़ते हैं — जैवदीप्ति के ये क्षणिक नक्षत्र टूटे हुए तारामंडलों की तरह जल में निलंबित रह जाते हैं, जो इस अन्यथा अदृश्य युद्ध के एकमात्र साक्षी हैं। चारों ओर समुद्री हिम — मृत कोशिकाओं, मल-कणों और कार्बनिक अवशेषों की यह अनवरत वर्षा — निस्तब्धता में धीरे-धीरे नीचे उतरती रहती है, और हजारों मीटर नीचे अथाह मैदान पर मैंगनीज पिंड और तलीय जीवों की मंद उपस्थिति एक धूसर-भूरे संसार का संकेत देती है। यह संसार किसी के लिए नहीं है — न किसी दृष्टि के लिए, न किसी स्मृति के लिए — यह केवल अपने आप में, अपनी अनंत चुप्पी में, अस्तित्व रखता है।