समुद्र की सतह से लगभग एक सौ बीस से डेढ़ सौ मीटर नीचे, जहाँ सूर्य का प्रकाश अपनी अंतिम साँस लेता है, वहाँ एक पतली पन्ने-रंगी परत क्षितिज की भाँति फैली हुई है — यह गहरी क्लोरोफ़िल अधिकतम परत है, जहाँ फ़ाइटोप्लैंकटन ऊपर से आते क्षीण प्रकाश और नीचे से उठते पोषक तत्वों के बीच संतुलन खोजकर सघन रूप से एकत्रित हो जाते हैं। ऊपर का जल नीलम और गहरे कोबाल्ट रंग में दमकता है, जबकि इस हरी धुंध के नीचे रंग धीरे-धीरे गहरे नील-बैंगनी में डूब जाता है, मानो महासागर यहाँ एक मौन दहलीज़ पार कर रहा हो। सैल्प — वे पारदर्शी, जेलीनुमा प्राणी जिनके शरीर में मांसपेशियों की धुंधली धारियाँ हैं — इस हरी वेल के बीच भारहीन होकर तैरते हैं, और जब सतह से उतरती मंद किरणें उनसे टकराती हैं तो उनकी काँचनुमा देह में एक हल्की चाँदी-सी चमक जाग उठती है। यहाँ दबाव ग्यारह वायुमंडल से भी अधिक है, तापमान तेज़ी से गिर रहा है, और पूरे जल स्तंभ में सूक्ष्म समुद्री हिमपात — मृत कोशिकाएँ, बलगम के धागे, और खनिज कण — धीमे-धीमे अँधेरे की ओर बह रहे हैं, उस विशाल, निर्जन गहराई की ओर जहाँ प्रकाश का कोई नाम नहीं।
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