अमावस की रात, जब आकाश पर कोई चाँद नहीं और क्षितिज का कोई सुराग नहीं, खुले समुद्र की सतह पर वर्षा की बूँदें लगातार गिरती हैं और पानी की ऊपरी त्वचा को अनगिनत सूक्ष्म-क्रेटरों और फैलती हुई वलयाकार लहरों में बदल देती हैं — यह वायु-सागर सीमांत का वह अत्यंत पतला परंतु तीव्र रूप से जीवित क्षेत्र है जहाँ भौतिकी, रसायन और जीवविज्ञान एक साथ घटित होते हैं। प्रत्येक बूँद के प्रहार पर, जल के भीतर कुछ सेंटीमीटर की गहराई तक एक अद्वितीय ध्वनि-तरंग फैलती है — वैज्ञानिक इसे "ध्वनि प्रभामंडल" कहते हैं — और इसी कंपन के उत्तर में समुद्री सतह की परत में तैरते एकल-कोशिकीय पादपप्लवक, विशेषतः नॉक्टिल्यूका और डाइनोफ्लैजेलेट्स, नीले-हरे रंग की तात्कालिक चमक उत्सर्जित करते हैं जो अंधकार में बिखरी चिनगारियों जैसी दिखती है। वर्षा का यह जल समुद्र की ऊपरी सतह को क्षणिक रूप से लवण-रहित और शीतल बनाता है, एक हल्की स्थिर स्तरित परत बनाकर जो नीचे के खारे जल से अलग तैरती रहती है, जबकि तरंगों की टूटती कंठाएँ और झागदार बुलबुले क्षणिक ठंडी जीवित रोशनी में रूपांतरित होकर फिर अँधेरे में विलीन हो जाते हैं। यह सब बिना किसी साक्षी के घटित होता है — केवल विशाल पेलैजिक महासागर, काला, वर्षा-पीड़ित, और अपने ही जीवन की नीली आग से रह-रहकर जलता हुआ।