समुद्र की यह सतह — वायु और जल के बीच की वह सूक्ष्म सीमारेखा — पृथ्वी के सबसे संवेदनशील और जीवंत पारिस्थितिक तंत्रों में से एक है। मात्र कुछ माइक्रोमीटर मोटी इस "समुद्री-सतह सूक्ष्म-परत" में लिपिड, प्रोटीन, फाइटोप्लैंक्टन के अवशेष और जीवाणु सघन रूप से संकेंद्रित होते हैं — यह जैव-रासायनिक दृष्टि से नीचे के खुले जल से सर्वथा भिन्न एक अलग ही संसार है। बोफोर्ट शून्य की इस निस्तब्ध अवस्था में, जब पवन लगभग अनुपस्थित होती है, सतह का तनाव इतना प्रबल हो जाता है कि केशिका तरंगें भी मुश्किल से जन्म ले पाती हैं, और आकाश का विशाल नीलापन जल में उतर कर एक चलायमान दर्पण रच देता है। दूर किसी तूफान की स्मृति बनकर आई एकल दीर्घ-तरंग इस काँचनुमा विस्तार को बहुत धीरे, बहुत मंद गति से भेदती है, जैसे ब्रह्माण्ड स्वयं साँस ले रहा हो। यह सतह न केवल वायुमंडल और महासागर के बीच ऊष्मा, गैस और नमी का आदान-प्रदान करती है, बल्कि यहाँ अस्तित्व रखने वाले न्यूस्टन जीव — लार्वा, कोपेपॉड, समुद्री बग — बिना किसी साक्षी के, बिना किसी मानवीय उपस्थिति के, इस चमकती हुई सीमा पर अपना जीवन जीते रहते हैं।