प्रशांत महासागर के उस बाहरी ढलान पर, जहाँ चूनापत्थर की दीवार अचानक गहरे नील में विलीन हो जाती है, हजारों फ्यूजिलियर मछलियों का झुंड तरल धातु की भाँति एकसाथ मुड़ता और लहराता है — उनके रुपहले-नीले शरीर सतह से उतरती सूर्य की तिरछी किरणों में क्षण-क्षण रंग बदलते हैं। ऊपर से आती वे किरणें — जिन्हें जल की लहरदार सतह ने तोड़-मरोड़ कर काँपते काॅस्टिक प्रकाश-जाल में बदल दिया है — मूंगे की चट्टानों पर, गोर्गोनियाई पंखाकार प्रवालों की नाजुक शाखाओं पर और पीले-गुलाबी-नारंगी एंथियास के झुंडों पर नृत्य करती हैं, जो गहरी दरारों और कगारों से चिपके, धाराओं के साथ अपना संतुलन साधते हैं। यह प्रवाल भित्ति — जो लाखों वर्षों में पॉलिप-निर्मित कैल्शियम कार्बोनेट से उठी है — ऊपर की ओर प्रकाश और जीवन से भरी है, जबकि उसके पाँव कोबाल्ट और गहरे इंडिगो के उस अनंत में डूबे हैं जहाँ दबाव बढ़ता है और सूर्य का स्पर्श धीरे-धीरे क्षीण होता जाता है। यहाँ कोई साक्षी नहीं, कोई उपस्थिति नहीं — केवल जल, प्रकाश, और वह विराट जीवन जो युगों से बिना किसी की दृष्टि की प्रतीक्षा किए, अपने आप में पूर्ण है।