आगे से तूफानी झाग
फेन और झाग

आगे से तूफानी झाग

समुद्र की सतह पर तूफ़ान की मार झेलते हुए, पनडुब्बी का अग्र-कैमरा उस अनंत उथल-पुथल को देखता है जहाँ हवा और जल की सीमा एक जीवित, श्वास लेती हुई संरचना बन जाती है — झाग की चादरें क्षितिज से तेज़ी से आती हैं, हरे-काले लहर-शिखर अपनी कड़वी नमकीन फुहारें क्षैतिज दिशा में उड़ाते हैं, और समुद्री माइक्रोलेयर की वह पतली जैव-रासायनिक त्वचा — जहाँ सर्फेक्टेंट, सूक्ष्मजीव और कार्बनिक पदार्थ असाधारण सघनता में मिलते हैं — टूटती और बनती रहती है। बुलबुलों की सघन वर्षा ऊपरी एक मीटर को चाँदी की तरह चमकाती है, क्योंकि तरंगों के टूटने से उत्पन्न वायु-स्तंभ प्रकाश को बिखेरते हैं और ऑक्सीजन तथा कार्बन डाइऑक्साइड के गहन आदान-प्रदान को तीव्र करते हैं — यही वह स्थान है जहाँ समुद्र अपनी साँस लेता है। उस बुदबुदाती रोशनी में, अम्बर-गुलाबी देह और चमकती काली आँखों वाले क्रिल के झुंड लहराते हैं, इस अशांत आवास में पले-बढ़े जीव, जबकि ऊपर स्नेल की खिड़की से टूटा हुआ, विकृत आकाश दिखता है — एक ऐसी दुनिया जो न पूरी तरह हवा है, न पानी, बल्कि दोनों के बीच का वह क्षणभंगुर, विज्ञान से भरा सन्धि-स्थल है।

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