चारकोल-काली चट्टानों की यह लगभग ऊर्ध्वाधर भित्ति पृथ्वी की सबसे गहरी खाई में डूबती चली जाती है, जहाँ दबाव लगभग ११०० वायुमंडल के बराबर है और प्रकाश की कोई भी किरण कभी नहीं पहुँची। भ्रंशित चट्टानी पसलियाँ और संकरी गलियाँ पीले-सफ़ेद अवसाद की महीन परतों से ढकी हैं, जो सहस्राब्दियों से झरते हुए समुद्री हिमपात — मृत कोशिकाओं, खनिज कणों और कार्बनिक अवशेषों के इस अविराम वर्षण — से बनी हैं। कहीं-कहीं नरम कगारों पर ज़ीनोफायोफ़ोर जैसी विशालकाय एककोशिकीय संरचनाएँ स्थिर बैठी हैं, जो इतने असाधारण दबाव में भी जैव-रासायनिक अनुकूलन की अद्भुत कहानी कहती हैं। अँधेरे जल में कुछ जेलीनुमा प्राणी बहते हुए अपनी ठंडी नीली-हरी जैव-संदीप्ति से उस विशाल शून्य की रूपरेखा क्षण भर के लिए उजागर करते हैं, फिर अँधकार उन्हें फिर से निगल लेता है। यह संसार मनुष्य की अनुपस्थिति में भी पूर्ण है — नीरव, दबावग्रस्त, और अपनी ही लय में जीवित।