नमक तट पर घात
समुद्र की अथाह गहराइयों में, जहाँ जल का दाब लगभग चार सौ वायुमंडल तक पहुँचता है और सूर्य की एक भी किरण कभी नहीं उतरती, एक ब्राइन पूल का दर्पण-सम तल अपनी सघन लवणीय सीमा पर नीले-हरे जैवदीप्त बिंदुओं की झिलमिलाहट से जीवन्त है — यह अतिलवणीय द्रव्यराशि आसपास के सामान्य जल से इतनी सघन है कि दोनों के मिलन पर एक काँच-सी चमकती सतह बन जाती है, जिसके किनारों पर जीवाणुओं की धुंधली दूधिया झिल्लियाँ और मैंगनीज पिंड बिखरे पड़े हैं। इसी अलौकिक सीमारेखा के ठीक ऊपर एक घायल कोलोसल स्क्विड (*Mesonychoteuthis hamiltoni*) अपनी पीली, घाव-भरी मेंटल लिए निष्प्रभ-सा तैर रहा है, उसकी भोजन-भुजाएँ शिथिल हो चुकी हैं और मुड़ती भुजाओं पर हुक-युक्त चूषक कपों की पंक्तियाँ दृश्यमान हैं, जबकि उसके क्षत-विक्षत शरीर के इर्द-गिर्द बाधित जल से नीली-हरी बायोल्युमिनेसेंस की लताएँ उठती हैं। इस जीवित प्रकाश की मद्धिम आभा में, ब्राइन तट से परे के श्याम जलस्तम्भ में, एक शुक्राणु व्हेल (*Physeter macrocephalus*) अपना विशाल सिर और झुर्रीदार पार्श्व घुमाती हुई मौन में विचरण कर रही है — उसकी त्वचा पर ताज़े वृत्ताकार चूषक-घावों के निशान इस अभी-अभी घटित संघर्ष की कथा कह रहे हैं। चारों ओर समुद्री हिमकण अँधेरे में स्वतंत्र रूप से बिखरे हैं, तल के निकट एक कोमल धुंध है, और असीम दबाव तथा स्तब्ध शीतलता की उपस्थिति में यह संसार — शिकारी और शिकार दोनों सहित — बिना किसी साक्षी के, अपनी ही गहन नियति में डूबा है।

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