रीफ दर्रे की धारा
सूर्य-प्रकाशित सतही जल

रीफ दर्रे की धारा

उष्णकटिबंधीय समुद्र में, जहाँ दो जल-राशियाँ एक संकरी प्रवाल-गली से टकराती हैं, सूरज की रोशनी लहराती सतह को चीरकर नीचे उतरती है और प्रवाल-शिराओं पर काँपती हुई प्रकाश-जाल बिछा देती है — तेज़ धाराएँ चूना-पत्थर की कगारों के ऊपर से बहती हैं, अपने साथ प्लवक और महीन कण उड़ाती हुई, जो नीले जल-स्तंभ में सूर्य-किरणों की छुअन से चमकते हैं। फ्यूसिलियर मछलियों का एक सुगठित झुंड धारा के सामने मुँह किए स्थिर खड़ा है — उनके चाँदी-नीले पहलू और हल्के पीले रंग के स्पर्श परावर्तित प्रकाश में एक ही क्षण में जम गए हैं, जैसे जल-स्वयं ने उन्हें आकार दिया हो। यहाँ दाब वायुमंडलीय स्तर से कुछ ही गुना अधिक है, सूर्यप्रकाश प्रकाश-संश्लेषण को पोषित करता है, और इस सुपारगम्य नीले में जीवन इतना सघन है कि प्रवाल के प्रत्येक उभार पर कोई न कोई प्राणी आश्रय लिए बैठा है। यह संसार बिना किसी साक्षी के, अपनी पूर्ण लय में चलता रहता है — धारा, प्रकाश, और प्रवाल की यह त्रिवेणी मनुष्य की स्मृति से कहीं पहले से बहती आ रही है।

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