खड्ड में पहली चमक
महाद्वीपीय ढलान

खड्ड में पहली चमक

महाद्वीपीय ढलान पर, समुद्री सतह से लगभग ५६० मीटर नीचे, जहाँ दबाव लगभग ५७ वायुमंडल के बराबर होता है, एक संकरी गली अँधेरे में मुड़ती है — उसकी भीतरी दीवार पर हाल ही में हुए भूस्खलन का ताज़ा घाव उघड़ा हुआ है, जहाँ धूसर-बादामी कीचड़ की परतें टूटकर बिखरी हैं और सिल्ट के नाज़ुक पर्दे लटक रहे हैं। गली के फर्श पर खिसकती हुई गाद की एक पतली चादर बिछी है, उसकी सतह इतनी कोमल है कि उस पर धाराओं की मद्धम तरंगें भी अपनी छाप छोड़ जाती हैं, और उसके ठीक ऊपर निलंबित कणों का एक झीना आवरण तैरता रहता है। ऊपर से आने वाली अवशिष्ट प्रकाश की अंतिम किरणें — मध्य-सागरीय गोधूलि क्षेत्र की वह धुंधली नीली आभा — कोबाल्ट से इन्डिगो में बदलते हुए इस खड्ड की ज्यामिति को मंद रूपरेखा में उभारती हैं, जबकि गली की बाहरी दीवार लगभग काले अँधेरे में विलीन हो जाती है। इसी अँधेरे में, गली के मोड़ के ठीक आगे, पारदर्शी झींगों के चौंककर छोड़े गए नीले-हरे जैव-प्रकाश के एकाकी बिंदु क्षण भर के लिए दमकते हैं — उनके काँच-जैसे शरीर, महीन श्रृंगिकाएँ और चाँदी-सी चमकती आँखें एक पल में प्रकट होकर फिर अँधेरे में घुल जाती हैं — और गली के किनारों पर बिखरे भंगुर तारे, बुर्ज के निशान और एक पीली समुद्री खीरा इस निर्जन, अनछुई दुनिया की मौन उपस्थिति की गवाही देते हैं।

Other languages